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मंगलवार, 19 सितंबर 2017

दोहे "एकल कवितापाठ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

एकल कवितापाठ का, अपना ही आनन्द।
रोज़ सृजन को कीजिए, करके कमरा बन्द।१।
--

कर खुद ही टिप्पणी, रोज निभाना धर्म।
तब आयेगा समझ में, कविताओँ का मर्म।२।
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टिप्पणियों के ढेर से, बन जाता आधार।
अपनी रचना बाँचकर, मिलते हैं उपहार।३।
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आम आदमी पिस रहा, मजे लूटता खास।
मँहगाई की मार से, मेला हुआ उदास।४।
--
प्रियतम भूला आपको, आप कर रहे याद।
पत्थर से करना नहीं, कोई भी फरियाद।५।
--
कम शब्दों के मेल से, दोहा बनता खास।
सरस्वती जी का रहे, सबके उर में वास।६।
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ठगती सबको लालसा, मानव हों या देव।
लालच बुरी बलाय है, इससे बचो सदैव।७।
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एक-एक कर सभी की, खोल रहे जो पोल।
सही राह बतला रहे, गुणीजनों के बोल।८।
--
देश खोखला कर दिया, जीना किया हराम।
आम आदमी हो रहे, फोकट में बदनाम।९।
--
फिर से पैदा हो गये, बाबर-औरंगजेब।
जिनमें उनकी ही तरह, भरे हुए हैं ऐब।१०।
--
वाणी में ही निहित हैं, सभी तरह के बोल
लेकिन कड़वे बोल से, विष का बनता घोल।११।
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सम्बन्धों की आड़ में, वासनाओं का खेल।
करके झूठी प्रशंसा, करते तन का मेल।१२।
--
आम आदमी पिस रहा, खास हो रहे मस्त।
जाली नोटों ने करी, यहाँ व्यवस्था ध्वस्त।१३।
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सामाजिक परिवेश में, आयी है अब मोच।
कुछ लोगों की हो गई, कितनी गन्दी सोच।१४।
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पलकों पर ठहरी हुई. इन्तज़ार की ओस।
बिना पिये जो हृदय को, कर देती मदहोश।१५।


सोमवार, 18 सितंबर 2017

गीत "माया की झप्पी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सूरज चमका नीलगगन में, फिर भी अन्धकार छाया
धूल भरी है घर आँगन में, अन्धड़ है कैसा आया

वृक्ष स्वयं अपने फल खाते, सरिताएँ जल पीती हैं
भोली मीन फँसी कीचड़ में, मरती हैं ना जीती हैं
आपाधापी के युग में, जीवन का संकट गहराया

मौज मनाते बाज और भोली चिड़ियाएँ सहमी हैं
दहशतगर्दों की उपवन में, पसरी गहमा-गहमी हैं
साठ-गाँठ करके महलों ने, जुल्म झोंपड़ी पर ढाया

खून-पसीने से श्रमिकों की, फलते हैं उद्योग यहाँ
निर्धनता पर जीवन भारी, शिक्षा का उपयोग कहाँ
धनिक-बणिक धनवान हो गये, परिश्रमी धुनता काया

अन्धे-गूँगे-बहरों की, सत्ता-शासन में भरती है
लेकिन जनता लाचारी में, मँहगाई से मरती है
जो देता माया की झप्पी, उसको ही मिलती छाया

रविवार, 17 सितंबर 2017

गीत "देवपूजन के लिए सजने लगी हैं थालियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


धान्य से भरपूर,

खेतों में झुकी हैं डालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

क्वार का आया महीना,
हो गया निर्मल गगन,
ताप सूरज का घटा,
बहने लगी शीतल पवन,
देवपूजन के लिए,
सजने लगी हैं थालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

सुमन-कलियों की चमन में,
डोलियाँ सजने लगीं,
भ्रमर गुंजन कर रहे,
शहनाइयाँ बजने लगीं,
प्रणय-मण्डप में मधुर,
बजने लगीं हैं तालियाँ।
धान के बिरुओं ने,
पहनी हैं नवेली बालियाँ।।

शनिवार, 16 सितंबर 2017

दोहे "चलना कभी न वक्र" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बचा हुआ जो नेह है, उसको रहा सहेज।
बुझने से पहले दिया, जलता कितना तेज।।

क्या जायेगा साथ में, करलो जरा विचार।
आने-जाने के लिए, खुले हुए हैं द्वार।।

जब हो जाता नीड़ का, जीर्ण-शीर्ण आकार।
हंस नहीं करता कभी, तब उसको स्वीकार।।

माटी जैसी हो वही, वैसा रचे कुम्हार।
कर देता है नियन्ता, नया पात्र तैयार।।

जीते जी ही जगत में, रहता हा हा कार।
मर जाने के बाद में, बचता लोकाचार।।

सोच-समझकर कीजिए, लोगों से संवाद।
दुनिया में इंसान की, नेकी आती याद।।

रुकता-थकता है नहीं, कभी काल का चक्र।
सीधी-सच्ची राह पर, चलना कभी न वक्र।।




शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

दोहे "हिन्दी से है प्यार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हिन्दी भाषा का हुआ, दूषित विमल-वितान।
स्वर-व्यंजन की है नहीं, हमको कुछ पहचान।।

बात-चीत परिवेश में, अंग्रेजी उपलब्ध।
क्यों हमने अपना लिए, विदेशियों के शब्द।।

सिसक रही है वर्तनी, खिसक रहा आधार।
अपनी हिन्दी का किया, हमने बण्टाधार।।

बेमन से हम बाँटते, भाषा का उपहार।
पखवाड़े भर के लिए, हिन्दी से है प्यार।।

हिन्दी पखवाड़ा गया, देकर ये सौगात।
एक साल के बाद फिर, हिन्दी की हो बात।।

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

कविता "मेरी कार का आठवाँ जन्मदिवस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कदम-कदम पर साथ निभाती।
कार हमारी हमको भाती।।

हिन्दीदिन पर इसको लाये।
हम सब मन में थे हर्षाये।।
आज आठवाँ जन्मदिवस है।
लेकिन अब भी जस की तस है।।
 
यह सफर की सखी-सहेली।
अब भी है ये नयी-नवेली।।

साफ-सफाई इसकी करते।
इसका ध्यान हमेशा धरते।।

सड़कों पर चलती मतवाली।
कभी न धोखा देने वाली।।

सदा सँवारो सबका जीवन।
चाहे जड़ हो या हो चेतन।।

पूरे घर को तुम हो भायी।
जन्मदिवस पर तुम्हें बधायी।


बुधवार, 13 सितंबर 2017

चौदह दोहे "जय हिन्दी-जय नागरी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हिन्दी का अवसान है, अँगरेजी की भोर।
इसीलिए तो देश में, हिन्दी है कमजोर।।

हम हिन्दी के जिगर में, घोंप रहे शमशीर।
अपनी भाषा का स्वयं, खींच रहे हम चीर।।

भारत को अब इण्डिया, हम सब रहे पुकार।
हिन्दी की हम एक दिन, करते जय-जयकार।

मत हिन्दी में माँगकर, जीता आम चुनाव।
फिर संसद में बैठकर, बदल गये सब भाव।।

अफसरशाही ने किया, हिन्दी को बरबाद।
पखवाड़े भर के लिए, हिन्दी आती याद।।

अँगरेजी इस्कूल अब, लगते हैं मकरन्द।
हिन्दी विद्यालय हुए, इसीलिए तो बन्द।।

निर्भय होकर खोदते, समरसता की मूल।
अब पश्चिम की सभ्यता, परस रहे इस्कूल।।

हिन्दी भी अच्छी नहीं, अँगरेजी है गोल।
पावन-पावन नीर में, भाँग रहे हैं घोल।।

सिसक रही माँ भारती, बिलख रहे हैं गीत।
कोने में वीणा पड़ी, लगती कालातीत।।

हिन्दी की गाथा नहीं, बिगड़ गये हैं बोल।
भाषा की तो वर्तनी, आज हो गयी गोल।।

कुछ काले अँगरेज ही, चला रहे सरकार।
इसीलिए तो हो रही, हिन्दी की है हार।।

अँगरेजी के दंश का, लगा देश को रोग।
कहने को आजाद हैं, भारत के हम लोग।।

जगत गुरू का रूप तो, आज हुआ विकराल।
आशाओं पर जी रहे, कब सुधरेंगे हाल।।

आयेंगे अच्छे दिवस, मन में है सन्तोष।
जय हिन्दी, जय नागरी, अपना है उद्-घोष।।

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