"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

गीत "मधुर वाणी बनाएँ हम" (दीपावली की शुभकामनाएँ)

हुआ मौसम गुलाबी अब,
चलो दीपक जलाएँ हम।
घरों में धान आये हैं,
दिवाली को मनाएँ हम।

बढ़ी है हाट में रौनक,
सजी फिर से दुकानें हैं,
मधुर मिष्ठान को खाकर,
मधुर वाणी बनाएँ हम।

मनो-मालिन्य को अपने,
मिटाने का समय है अब,
घरों के साथ आँगन को,
करीने से सजाएँ हम।

छँटें बादल गगन से हैं,
हुए निर्मल सरोवर हैं,
चलो तालाब में अपने,
कमल मोहक खिलाएँ हम।

सुमन आवाज देते हैं,
चलो सींचे बगीचों को,
चमन मैं आज फिर से,
कुछ नये पौधे उगाएँ हम।

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

गीत "दीप खुशियों के जलें" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

आओ फिर से हम नये, उपहार की बातें करें
प्यार का मौसम हैआओ प्यार की बातें करें।

नेह की लेकर मथानीसिन्धु का मन्थन करें,
छोड़ कर छल-छद्मकुछ उपकार की बातें करें।

आस का अंकुर उगाओदीप खुशियों के जलें,
प्रीत का संसार हैसंसार की बातें करें।

भावनाओं के नगर मेंछेड़ दो वीणा के सुर,
घर सजायें स्वर्ग सामनुहार की बातें करें।

कदम आगे तो बढ़ाओसामने मंजिल खड़ी,
जीत के माहौल हैक्यों हार की बातें करें।

जिधर देखो, उधर ही है, बोलबाला “रूप” का,
सादगी के साथ हम, अधिकार की बातें करें।

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

दोहे "सबको दो उपहार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


दीपक जलता है तभी, जब हो बाती-तेल।

खुशिया देने के लिए, चलता रहता खेल।१।
--
तम को हरने के लिए, खुद को रहा जलाय।
दीपक काली रात को,  आलोकित कर जाय।२।
--
झिलमिल-झिलमिल जब जलें, दीपक एक कतार।
तब बिजली की झालरें, लगती हैं बेकार।३।
--
मेधावी मेधा करें, उन्नत करें चरित्र।
मातु शारदे को नहीं, बिसरा देना मित्र।४।
--
लछमी और गणेश के, साथ शारदे होय।
उनका दुनिया में कभी, बाल न बाँका होय।५।
--
दीवाली का पर्व है, सबको दो उपहार।
आतिशबाजी का नहीं, दीपों का त्यौहार।६।
--
दौलत के मद में नहीं, बनना कभी उलूक। 

शिक्षा लेकर दीप से, करना सही सुलूक।७।

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

गीत "नन्हें दीप जलायें हम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दीवाली पर आओ मिलकर,
नन्हें दीप जलायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

आओ स्वच्छता के नारे को
दुनिया में साकार करें
चीन देश की चीजों को
हम कभी नहीं स्वीकार करें
छोड़ साज-संगीत विदेशी
देशी साज बजायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

कंकरीट की खेती से
धरती को हमें बचाना है
खेतों में श्रम करके हमको
गेहूँ-धान उगाना है
अपने खेतों की मेढ़ों पर
आओ वृक्ष लगायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

मजहब के ठेकेदारों की
बन्द दुकानें करनी हैं
भाईचारे की भारत में
नयी नींव अब धरनी हैं
लालन-पालन करने वाली
माँ की महिमा गायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

असली घर में नकली पौधों
का, अब कोई काम न हो
कुटिया में महलों में अपने
कहीं छलकते जाम न हो
बन्द करो मयखाने सारे
शासन को चेतायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

देव संस्कति को अपनाओ
रक्ष सभ्यता को छोड़ो
 राम और रहमान एक हैं
उनसे  ही नाता जोड़ो
भेद-भाव, अलगाववाद का
वातावरण मिटायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

गीत "मिट्टी के ही दिये जलाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
पिछले वर्ष 16 अक्तूबर, 2016 को
निम्न गीत लिखा था,
परन्तु इस गीत की कुछ पंक्तियों में
थोड़ा बदलाव करके
बहुत से लोगों ने इस गीत को
अपने नाम से यू-ट्यूब पर
लगा दिया है।
देश के धन को देश में रखना,
बहा न देना नाली में।
मिट्टी के ही दिये जलाना,
अबकी बार दिवाली में।।

बने जो अपनी माटी से
वो दीप बिकें बाजारों में,
भरी हुई है वैज्ञानिकता.
अपने सब त्यौहारों में,
राष्ट्र हितों का गला घोंटकर
छेद न करना थाली में।
मिट्टी के ही दिये जलाना,
अबकी बार दिवाली में।।

त्यौहारों पर अब गरीब की,
जेब कभी ना खाली हो।
झिलमिल नन्हें दीप जलें जब,
काली नहीं दिवाली हो।
देश की सीमा रहे सुरक्षित
चूक न हो रखवाली में।
मिट्टी के ही दिये जलाना,
अबकी बार दिवाली में।।

रहे देश की दौलत
अपने ही लोगों की झोली में।
मिलता है आनन्द हमेशा,
अपनी ही रंगोली में।
योगदान है सबका होता
जनता की खुशहाली में।
मिट्टी के ही दिये जलाना,
अबकी बार दिवाली में।।

वस्तु स्वदेशी अपनाने का
आओ हम सब प्रण कर लें,
अपने उत्पादन से अपना,
दामन खुशियों से भर लें।
गले मिलें सब लोग देश के,
होली, ईद-दिवाली में।
मिट्टी के ही दिये जलाना,
अबकी बार दिवाली में।।

गीत "पथ का निर्माता हूँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिनका पेटभरा हो उनको, भोजन नहीं कराऊँगा।
जिस महफिल में उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।

महाइन्द्र की पंचायत में, भेदभाव की है भाषा,
अपनो की महफिल में, बौनी हुई सत्य की परिभाषा,
ऐसे सम्मेलन में, खुद्दारों का होगा मान नहीं,
नहीं टिकेगी वहाँ सरलता, ठहरेंगे विद्वान नही,
नोक लेखनी की अपनी में, भाला सदा बनाऊँगा।
जिस महफिल में उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।

जिस सरिता में बहती प्रतिपल, व्यक्तिवाद हो धारा,
उससे लाख गुना अच्छी है, रत्नाकर की जल खारा,
नहीं पता था अमृत के घट में, होगा विष भरा हुआ,
आतंकों की परछायी से, राजा होगा डरा हुआ,
जिस व्यंजन को बाँटे अन्धा, उसे नहीं मैं खाऊँगा।
जिस महफिल में उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।

उस पथ को कैसे भूलूँगा, जिस पथ का निर्माता हूँ,
मैं चुपचाप नहीं बैठूँगा, माता का उद्गाता हूँ,
ऊसर धरती में भी मैंने, बीज आस के बोए हैँ,
शब्दों की माला में, नूतन मनके रोज पिरोए हैं,
खर-पतवार हटा उपवन में, पौधे नये लगाऊँगा।
जिस महफिल में उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

ग़ज़लिका "उलझे हुए सवालों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उग आये शैवाल गाँव के तालों में
पेंच फँसें हैं उलझे हुए सवालों में

करूँ समर्पित कैसे गंगा जल को अब
नकली सूरज हँसता खूब उजालों में

गोशालाएँ सिसक-सिसक दम तोड़ रहीं
भरा हुआ है दोष हमारे ग्वालों में

दूध-दही, गेहूँ-चावल में जहर भरा
स्वाद कहाँ से लायें आज निवालों में

लोकतन्त्र का रूप घिनौना है अब तो
लिप्त हुआ जनसेवक कुटिल कुचालों में

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails