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गुरुवार, 27 जुलाई 2017

दोहे "नागपंचमी-अद्भुत अपना देश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

श्रावण शुक्ला पञ्चमी, बहुत खास त्यौहार।
नागपञ्चमी आज भी, श्रद्धा का आधार।१।
--
महादेव ने गले में, धारण करके नाग।
विषधर कण्ठ लगाय कर, प्रकट किया अनुराग।२।
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दुनिया को अमृत दिया, किया गरल का पान।
जो करते कल्याण को, उनका होता मान।३।
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अद्भुत अपनी सभ्यता, अद्भुत अपना देश।
दया-धर्म के साथ में, सजा हुआ परिवेश।४।
--
खग-मृग, हिल-मिल कर रहे, दुनिया रहे निरोग।
नागदेव रक्षा करें, निर्भय हों सब लोग।५।
--
पूरी निष्ठा से करो, अपने-अपने कर्म।
जीवों पर करना दया, सिखलाता है धर्म।६।
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मन्दिर-मस्जिद-चर्च की, नहीं हमें दरकार।
पंडित-मुल्ला-पादरी, बने न ठेकेदार।७।
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जो कण-कण में रम रहा, वो है मालिक एक।
धर्मपरायण सब रहें, बने रहें सब नेक।।
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मन में कभी न लाइए, ऊँच-नीच का भेद।
नौका में करना नहीं, जान-बूझ कर छेद।८।
--
वैज्ञानिकता से भरा, पर्वों का विन्यास।
ये देते हैं ऊर्जा, लाते हैं उल्लास।९।

दोहे "बन बैठे अधिराज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सहयोगी करने लगें, जब कुछ ओछे कर्म।
पल्ला उनसे झाड़ना, सबसे अच्छा कर्म।।

हो जाये जब भुनन में, तारा ताराधीश।
तब विवेक से काम को, करता है नीतीश।।

तेजस्वी का बन गया, घोटाला नैमित्त।
एक चाल से ही किया, लालू जी को चित्त।।

सत्ता पाने के लिए, किया पुराना काज।
फिर से पाला बदल कर, बन बैठे अधिराज।।

जनमत की किसको यहाँ, रहती है परवाह।
राजनीति के मूल में, कुरसी की है चाह।।

बुधवार, 26 जुलाई 2017

गीत "झंझावातों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मानव दानव बन बैठा हैजग के झंझावातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

होड़ लगी आगे बढ़ने कीमची हुई आपा-धापी,
मुख में राम बगल में चाकूमनवा है कितना पापी,
दिवस-रैन उलझा रहता हैघातों में प्रतिघातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

जीने का अन्दाज जगत मेंकितना नया निराला है,
ठोकर पर ठोकर खाकर भीखुद को नही संभाला है,
ज्ञान-पुंज से ध्यान हटाकरलिपटा गन्दी बातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

मित्रपड़ोसीऔर भाईभाई के शोणित का प्यासा,
भूल चुके हैं सीधी-सादीसम्बन्धों की परिभाषा।
 विष के पादप उगे बाग मेंजहर भरा है नातों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

एक चमन में रहते-सहतेजटिल-कुटिल मतभेद हुए,
बाँट लिया गुलशन कोलेकिन दूर न मन के भेद हुए,
खेल रहे हैं ग्राहक बन करदुष्ट-बणिक के हाथों में।
दिन में डूब गया है सूरजचन्दा गुम है रातों में।।

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

गीत " सावन की हरियाली तीज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चाँद दिखाई दिया दूज का,
फिर से रात हुई उजियाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

भर सोलह सिंगार धरा ने,
फिर से अपना रूप निखारा।
सजनी ने साजन की खातिर,
सावन में तन-बदन सँवारा।
आँगन-कानन में बरसी है,
बारिश बनकर आज मवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

आँगन के कट गये पेड़ सब,
पड़े हुए झूले घर-घर में।
झूल रहीं खुश हो बालाएँ,
गूँज रहे मल्हार नगर में।
मस्त फुहारें लेकर आयी,
नभ पर छाई बदरी काली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

उपवन में कोमल कलियों की,
भीग रही है चूनर धानी।
खेतों में लहराते बिरुए,
आसमान का पीते पानी।
पुरवय्या के झोंखे आते,
बल खाती पेड़ों की डाली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

घेवर-फेनी और जलेबी,
अच्छी लगती चौमासे में।
लेकिन अब त्यौहार हमारे,
हैं मँहगाई के फाँसे में।
खास आदमी मजे उड़ाते,
जेब आम की बिल्कुल खाली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

शर्माया-सकुचाया सा,
उग आया चाँद गगन में।
आया है त्यौहार तीज का,
हर्ष समाया मन में।
महिलाएँ आँगन उपवन में ,
झूल रहीं होकर मतवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।। 

सोमवार, 24 जुलाई 2017

दोहे "तीजो का त्यौहार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब पड़ती चौमास में, रिमझिम सुखद फुहार।।
तब आते बरसात में, तीज और त्यौहार।।
--
हरी-भरी धरती हुई, उफन रहे हैं ताल।
उछल-कूद के साथ में, दादुर करें धमाल।।
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बरखा का जलपान कर, धान रहे लहराय।
चरागाह में चर रहे, घोड़े-खच्चर-गाय।।
--
कुदरत के उपहार ये, लगते बहुत हसीन।
मखमल जैसी घास के, बिछे हुए कालीन।।
--
घेवर लेकर आ गया, तीजो का त्यौहार।
घर-घर में झूले पड़े, झूल रहे नर-नार।।
--
हाथों में मेंहदी रचा, पहन गले में हार।
तीजों पर तो नारियाँ, करती हैं सिंगार।।
--
उपवन कानन-बाग में, बरस रहा है नूर।
कंटक पेड़ खजूर पर, फल लटके भरपूर।।
  

रविवार, 23 जुलाई 2017

गीत "सावन में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सपनों में ही पेंग बढ़ातेझूला झूलें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भीहमने भूलें सावन में।।

मँहगाई की मार पड़ी हैघी और तेल हुए महँगे,
कैसे तलें पकौड़ी अबपापड़ क्या भूनें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भीहमने भूलें सावन में।।

हरियाली तीजों परकैसे लायें चोटी-बिन्दी को,
सूखे मौसम में कैसेअब सजें-सवाँरे सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भीहमने भूलें सावन में।।

आँगन के कट गये नीम,बागों का नाम-निशान मिटा,
रस्सी-डोरी के झूलेअब कहाँ लगायें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भीहमने भूलें सावन में।।

शनिवार, 22 जुलाई 2017

प्रकाशन "दोहा दंगल में मेरे दोहे"

अमर शहीदों का कभी, मत करना अपमान।
किया इन्दोंने देशहित, अपना तन बलिदान।।

जीवन तो त्यौहार है, जानों इनका सार।
प्यार और मनुहार से, बाँटो कुछ उपहार।।

जब तक सूरज-चन्द्रमा, तब तक जीवित प्यार।
दौलत से मत तौलना, पावन प्यार-दुलार।।

गौमाता से ही मिले, दूध-दही-नवनीत।
सबको होनी चाहिए, गौमाता से प्रीत।।

कैमीकल का उर्वरक, कर देगा बरबाद।
खेतों में डालो सदा, गोबर की ही खाद।।

कुटिया-महलों में जलें, जगमग-जगमग दीप।
सरिताओं के रेत में, मोती उगले सीप।।

पथ में मिलते रोज ही, भाँति-भाँति के लोग।
तब ही होती मित्रता, जब बनता संयोग।।

रक्खो कदम जमीन पर, मत उड़ना बिन पंख।
जो पारंगत सारथी, वही बजाता शंख।।

सरिता और तड़ाग के, सब ही जाते तीर।
मगर आचमन के लिए, गंगा का है नीर।।

शिशुओं की किलकारियाँ, गूँजें सबके द्वार।
बेटा-बेटी में करो, समता का व्यवहार।।

चाहे कोई वार हो, कोई हो तारीख।
संस्कार देते हमें, कदम-कदम पर सीख।।

तोड़ रही दम सभ्यता, आहत हैं परिवेश।
पुस्तक तक सीमित हुए, सन्तों के सन्देश।।

झेल नहीं पाया मनुज, कभी समय का वार।
ज्ञानी-राजा-रंक भी, गये समय से हार।।

कभी रूप की धूप पर, मत करना अभिमान।
डरकर रहना समय से, समय बड़ा बलवान।।

सच्ची होती मापनी, झूठे सब अनुमान।
ताकत पर अपनी नहीं, करना कुछ अभिमान।।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

विविध दोहे ''सीधी-सच्ची बात'' (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

भारत माता के लिएहुए पुत्र बलिदान।
ऐसे बेटों पर सदामाता को अभिमान।१।

दिल से जो है निकलतीवो ही करे कमाल।
बेमन से लिक्खी हुईकविता बने बबाल।२।

राजनीति के खेल मेंकुटिल चला जो चाल।
उसकी जय-जयकार हैउसका ही सब माल।३।

चलते-चलते सफर मेंबन जाते संयोग।
मिलते हैं इसजगत में, सभी तरह के लोग।४।

फल-तरकारी खाइएनिखर जाएगा रंग।
तला-भुना खाकर नहींहोता निर्मल अंग।५।

सीमित शब्दों में कहोसीधी-सच्ची बात।
जली-कटी कहकर कभीदेना मत आघात।६।

उपादान के मर्म कोसमझ लीजिए आज।
धर्म और सत्कर्म सेसुधरे देश-समाज।७।

अनाचार को देखकरलोग हो रहे मौन।
नौका लहरों में फँसीपार लगाये कौन।८।

करती हैं दो पंक्तियाँ, दिल पर करतीं वार।
होता दोहा छन्द है, दोधारी तलवार।९।

सदा कलम से हारतीतोप और तलवार।
सबसे तीखी विश्व मेंशब्दों की है मार।१०।

जो दिल से निकलें वहीसच्चे हैं अशआर।
सच्चे शेरों से सभीकरते प्यार अपार।११।

मानव दानव बन रहाकरता कृत्य जघन्य।
सजा मौत से कम नहींइनको हो अनुमन्य।१२।

जिसकी जैसी सोच हैवैसी उसकी होड़।
कोई मद्धिम चल रहाकोइ लगाता दौड़।१३।

हास और परिहास सेमिलता है आनन्द।
लम्बे जीवन के लिएसूत्र यही निर्द्वन्द।१४।

सोच-सोच में हो गईअपनी उम्र तमाम।
बचा जरा सी ज़िन्दगीकैसे होंगे काम।१५।

सावन सूखा हो रहानहीं बरसते नीर।
निर्धनश्रमिक-किसान कामन हो रहा अधीर।१६।

मिल जाता जब किसी कोउसके मन का मीत।
अंग-अंग में थिरकताप्यारभरा संगीत।१७।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

बालकविता "नभ पर घटा घिरी है काली" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




सावन की है छटा निराली
धरती पर पसरी हरियाली

तन-मन सबका मोह रही है
नभ पर घटा घिरी है काली

मोर-मोरनी ने कानन में
नृत्य दिखाकर खुशी मना ली

सड़कों पर काँवड़ियों की भी
घूम रहीं टोली मतवाली

झूम-झूम लहराते पौधे
धानों पर छायीं हैं बाली

दाड़िम, सेब-नाशपाती के,
चेहरे पर छायी है लाली

लेकिन ऐसे में विरहिन का
उर-मन्दिर है खाली-खाली

प्रजातन्त्र के लोभी भँवरे
उपवन में खा रहे दलाली

कैसे निखरे "रूप" गुलों का
करते हैं मक्कारी माली 

सोमवार, 17 जुलाई 2017

ग़ज़ल "रोटी पकाना सीखिए अपने तँदूर पे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब
मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
221 2121 1221 212
--
इतना सितम अच्छा नहीं अपने सरूर पे
तुम खुद ही पुरज़माल हो अपने शऊर पे

इंसानियत को दरकिनार कर दिया तुमने
इतना नशे में चूर हो अपने गुरूर पे

दिल से नहीं दिमाग़ से सोचा करो कभी
रोटी पकाना सीखिए अपने तँदूर पे

यूँ अपनी इबादत का दिखावा न कीजिए
ईमान भी तो लाइए अपने हुजूर पे

कितना ग़ुमान “रूप” को अपने फितूर पे
गिनते नहीं हो खामियाँ अपने कसूर पे

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